
तिलका माझी शहादत दिवस पर विनम्र श्रद्धांजलि
- S S Mahali

- 13 जन॰
- 3 मिनट पठन

जोहार 🏹
आज हम धरती आबा के पहले विद्रोही वीर शहीद तिलका माझी जी के शहादत दिवस पर उन्हें नमन करते हैं।
तिलका माझी जी ने अंग्रेजी हुकूमत, जमींदारी शोषण और अन्याय के खिलाफ सबसे पहले आदिवासी स्वाभिमान की आवाज़ बुलंद की।
तिलका मांझी ने 1784 में भागलपुर के ब्रिटिश कलेक्टर अगस्टस क्लीवलैंड को अपने जहरीले तीर से मारकर उनकी हत्या कर दी थी,
उन्होंने साबित कर दिया कि आदिवासी समाज कभी गुलामी स्वीकार नहीं करता वह अन्याय के विरुद्ध हमेशा खड़ा रहता है।

आदिवासी क्रांतिकारी जिन्होंने अंग्रेजों को “लोहे के चने चबवा दिए” — वो थे वीर टिलका मांझी! 🏹🔥
तिलका माझी कोई साधारण नाम नहीं…
वो आदिवासी स्वाभिमान, जल-जंगल-जमीन और आज़ादी के पहले शंखनाद का प्रतीक हैं।
📌 1771 से 1784 तक
उन्होंने ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ लगातार 13 वर्षों तक
एक ऐसी लड़ाई लड़ी जो कभी झुकी नहीं, कभी टूटी नहीं, कभी समर्पण नहीं किया। ✊
आज भी इतिहास में एक गलत नैरेटिव चलाया गया—
कि 1857 का सिपाही विद्रोह ही “पहली आज़ादी की लड़ाई” था।
लेकिन सच ये है कि —
✅ आदिवासी क्रांति उससे बहुत पहले शुरू हो चुकी थी।
✅ तिलका माझी जैसे महायोद्धा पहले ही अंग्रेजों की नींव हिला चुके थे।
दुख की बात ये है कि—
आदिवासी क्रांतिकारियों का इतिहास योजनाबद्ध तरीके से दबाया गया, उनके संघर्ष को किताबों से मिटाया गया,
और असली नायकों की जगह कृत्रिम इतिहास पढ़ाया गया।
अब समय है—
🔥 हम अपने असली नायकों को पहचानें
🔥 आदिवासी इतिहास को जन-जन तक पहुँचाएँ
🔥 तिलका माझी की क्रांति को सम्मान दें
वीर टिलका मांझी अमर रहें!
आदिवासी स्वाभिमान अमर रहें! ✊🌿
वीर शहीद तिलका माझी जी भारत के महान आदिवासी स्वतंत्रता सेनानी थे, जिन्होंने अंग्रेजी शासन, जमींदारी शोषण और अन्याय के खिलाफ सबसे पहले आदिवासी समाज की आवाज़ बुलंद की। उनका जन्म पहाड़ी और वन क्षेत्र में आदिवासी समाज के बीच हुआ, जहाँ उन्होंने बचपन से ही संघर्ष, मेहनत और प्रकृति के साथ जीवन जीना सीखा। उस समय अंग्रेजों की नीतियों, जमींदारों और महाजनों द्वारा आदिवासियों की जमीन छीनना, भारी लगान वसूलना और अत्याचार करना आम बात थी। इन परिस्थितियों में तिलका माझी ने आदिवासी समाज को जागरूक किया और उन्हें संगठित कर अपने अधिकारों के लिए लड़ने का साहस दिया। वे जंगल और पहाड़ों की रणनीति में निपुण थे तथा धनुष-बाण और पारंपरिक हथियारों के बल पर अंग्रेजों को कड़ी चुनौती दी। उनका संघर्ष केवल युद्ध नहीं था बल्कि जल-जंगल-जमीन, आदिवासी अस्मिता, स्वाभिमान और संस्कृति की रक्षा का आंदोलन था। अंततः अंग्रेजों ने उन्हें पकड़कर क्रूर दंड दिया और वे शहीद हो गए, लेकिन उनका बलिदान आज भी आदिवासी समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

उनका बलिदान हमें सिखाता है—
✅ अन्याय के खिलाफ संघर्ष
✅ अधिकार, आत्मसम्मान और पहचान की रक्षा
✅ संगठन, एकता और जागरूकता

तिलका माझी जी का जीवन हमें यह संदेश देता है कि अन्याय के सामने कभी झुकना नहीं चाहिए और अपने अधिकार, सम्मान व पहचान के लिए एकजुट होकर संघर्ष करना ही सच्ची देशभक्ति है। ✊🔥
वीर तिलका माझी अमर रहें! ✊🔥
जल-जंगल-जमीन की रक्षा का संकल्प लें! 🌿🏹
📌 वीर शहीद की कुर्बानी बेकार न जाए — यही सच्ची श्रद्धांजलि है।
हूल जोहार ✊🔥
S S Mahali 🏹
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