
राज्य स्तरीय माझी मंडवा बैठक, भाग-2
- S S Mahali

- 4 अग॰ 2025
- 8 मिनट पठन
📍 राज्य स्तरीय माझी मंडवा बैठक - बारिपदा, ओडिशा
📅 आज का आयोजन | 🧑🤝🧑 156 गांव के माझी बाबाओं के संग बैठक।

आज दिनांक 3 अगस्त 2025 को ओडिशा के बारिपदा में महली समाज की एक राज्य स्तरीय माझी मंडवा बैठक का आयोजन किया गया। यह बैठक सामाजिक संरचना, परंपरा, और नियमों के एकरूप विकास की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम था, जिसमें मयूरभंज सहित ओडिशा के विभिन्न जिलों से लगभग 160 से अधिक माझी बाबा उपस्थित हुए।
🔹 इस बैठक में जन्म से लेकर मृत्यु तक के सभी सामाजिक संस्कारों पर विस्तृत चर्चा की गई।
🔹 सामाजिक अनुष्ठानों को सुव्यवस्थित और एकरूप करने के लिए समाज में प्रचलित नियमों और परंपराओं का समग्र रिव्यू किया गया।
🧑⚖️ बैठक की अध्यक्षता ओडिशा पोनोत माझी बाबा गोरा चांद माहली के द्वारा की गई एवं 🎤 बैठक का सफल संचालन दुमेश्वर बास्के ने किया।

📜 इस बैठक का पहला भाग 22 दिसंबर 2024 को आयोजित किया गया था, जिसमें उपरोक्त विषयों पर प्रारंभिक विमर्श किया गया था। आज की बैठक उसी श्रृंखला का द्वितीय भाग हैं। आगामी और अंतिम चरण की बैठक 25 से 28 दिसंबर 2025 के बीच किसी एक तिथि को प्रस्तावित है, जिसमें सर्वसम्मति से सभी नियमों को लिखित रूप दिया जाएगा और प्रामाणिक दस्तावेज तैयार किया जाएगा। जिसमें इन्हीं विषयों पर प्रारंभिक विमर्श हुआ था।
👉 दोनों बैठकों में सामाजिक एकता के दृष्टिकोण से यह विचार रखा गया कि जन्म से मृत्यु तक के सभी सामाजिक अनुष्ठानों में एकरूपता लाई जाए, ताकि समाज में अनुशासन, समानता और पहचान मजबूत हो।
समाई माहली ने मीडिया को अपने संबोधन में निम्न बातें कही
📌 महत्वपूर्ण उद्देश्य:
>सांस्कृतिक विरासत की रक्षा करना
>नई पीढ़ी को स्पष्ट दिशा प्रदान करना
>सामाजिक नियमों का दस्तावेजीकरण करना
>नियम एवं परंपराओं में एकरूपता और स्पष्टता लाना
>पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था संरचना को सुदृढ़ बनाना
'एक समाज – एक नियम' की भावना को मूर्त रूप देना

S S Mahali झारखंड पोनोत जोग मांझी ने अपने संबोधन में कहा कि महली समाज के नव निर्माण की दिशा में एक दृढ़ संकल्प होकर आगे बढ़ना हैं। समाज की वर्तमान स्थिति और भविष्य की दिशा पर सारगर्भित विचार प्रस्तुत किए। उन्होंने समाज को सशक्त और संगठित करने के लिए एक स्पष्ट कार्ययोजना और आह्वान रखा।
🔸 गांव से शुरू हो बदलाव की यात्रा: "समाज की असली ताकत गांवों में निहित है। जब गांव जागरूक और संगठित होंगे, तभी समाज की आत्मा जागृत होगी। अतः प्रत्येक महली गांव में पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था के तहत मांझी बाबा की अध्यक्षता में हर सप्ताह नियमित बैठकें आयोजित करना अत्यंत आवश्यक है। इन बैठकों से न केवल संवाद बढ़ेगा बल्कि सामाजिक चेतना और एकता को भी बल मिलेगा।"
🔸 अब समय आ गया है चुप्पी तोड़ने का, समाज के लिए बोलने और करने का: बहुत समय तक महली समाज चुप बैठा रहा, लेकिन अब चुप्पी तोड़ने का समय है। हर महली व्यक्ति को अपने अस्तित्व, अधिकार और इतिहास के लिए मुखर होना पड़ेगा। यदि हम अब भी चुप रहे, तो हमारी आने वाली पीढ़ियों को अपनी पहचान ढूंढने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा।
🔸 ‘मौन 🤫 तोड़ो, महली 🤝 जोड़ो’ – एक जनआंदोलन की शुरुआत: "अब वक्त आ गया है कि हम ‘मौन तोड़ो और सभी महली लोगों को जोड़ो’ इस अभियान को राष्ट्रीय स्तर पर चला कर भारत के कोने-कोने में ही नहीं, बल्कि विभिन्न देशों में भी फैले महली समुदाय के लोगों को एक सूत्र में बाँधना होगा। हम सबका उद्देश्य एक मंच पर आकर समाज की एकता और गरिमा को पुनर्स्थापित करना है।"
🔸 समानता और समरसता ही समाज की असली शक्ति है: समाज में व्याप्त वर्गभेद और आत्महीनता की भावना पर चिंता व्यक्त करते हुए S S Mahali ने कहा कि "समाज किसी एक व्यक्ति या वर्ग का नहीं होता। यह हम सबका है — अमीर-गरीब, शिक्षित-अशिक्षित, गांव और शहर के निवासी, सभी इसमें बराबर के भागीदार हैं। हमें यह समझना होगा कि अगर हम आपस में एकता नहीं रखेंगे, तो हमारा समाज कभी मज़बूत नहीं बन पाएगा। हमें अब आगे आकर स्वयं नेतृत्व करना होगा, न कि दूसरों के सहारे बैठना है। हर गांव, हर मोहल्ला, हर क्षेत्र में एकजुट होकर कार्य करने की आवश्यकता है। जब तक समाज के हर व्यक्ति की भागीदारी नहीं होगी, तब तक सशक्त महली समाज की कल्पना अधूरी रहेगी।" उपरोक्त विचार केवल बाते नहीं हैं, ये महली समाज के पुनर्जागरण की घोषणा है — जिसमें परंपरा, संगठनात्मक व्यवस्था, आत्मसम्मान और समरसता को केंद्र में रखा गया है।

🗣️ पूर्वी सिंहभूम तोरोप जोग मांझी बा मार्डी का महत्वपूर्ण संबोधन में सांस्कृतिक परंपराओं और जोम-जाति की अवधारणा पर विशेष प्रकाश डालते हुए अपने सारगर्भित संबोधन में महली समाज की पारंपरिक सामाजिक व्यवस्थाओं, रीति-रिवाजों और जोम-जाति जैसे संस्कार को गहराई से व्याख्या करते हुए उपस्थित जनसमूह को न केवल जागरूक किया, बल्कि उन्हें अपने मूल आदिवासी मूल्यों से जुड़ने की प्रेरणा भी दी।
🔸 सांस्कृतिक रीति-रिवाजों का महत्व: "महली समाज की पहचान केवल भाषा या पहनावे से नहीं, बल्कि हमारी परंपराओं और रीति-रिवाजों से है। जन्म, विवाह, मृत्युभोज, पूजा-अनुष्ठान जैसे सामाजिक अवसरों पर जो नियम-धर्म निभाए जाते हैं, वे हमारी संस्कृति की जड़ें हैं।" उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ये परंपराएं केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि समाज को नैतिक अनुशासन और सामूहिक उत्तरदायित्व की भावना सिखाती हैं।
🔸 जोम-जाति की संकल्पना महली समाज की अनूठी सामाजिक संरचना हैं: उन्होंने विशेष रूप से ‘जोम-जाति’ विषय पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि ‘जोम’ का अर्थ है खान - पान हैं, तो वहीं ‘जाति’ का अर्थ है शुद्धीकरण करना मात्र हैं। इस अनुष्ठान को अन्यथा पररिभाषित कर इसका स्वरूप को कोई परिवर्तित न करें। समाज में इस अनुष्ठान का भी मुख्य भूमिका हैं।
📌 उन्होंने बताया कि जोम-जाति का उद्देश्य है:
✅ समाज में व्यभिचार की संभावना को रोकना और सामाजिक संतुलन को बनाए रखना,
✅ विवाह सम्बन्धों में मर्यादा बनाए रखना,
✅ समाज में परस्पर सम्मान, संयम और सामंजस्य बनाए रखना हैं।
🔸 बासुदेव मार्डी ने इस बात पर जोर दिया कि माझी - परगना व्यवस्था हमारे स्वशासी सामाजिक तंत्र (Self-Governance System) की रीढ़ है। जब समाज का प्रत्येक व्यक्ति अपने सामाजिक नियमों का पालन करता है, तो समाज में अनुशासन और सम्मान बना रहता है।" उन्होंने माझी, परगना, गोडेत, नायके, प्राणिक की भूमिकाओं को भी इसी व्यवस्था का अभिन्न पद है "ये पद केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि समाज को सही दिशा देने और विवाद समाधान एवं समाज का संचालन में अहम भूमिका निभाने वाले संरचनात्मक स्तंभ हैं।"
🔸 नए दौर में पुरानी परंपराओं की प्रासंगिकता
अपने संबोधन के अंत में उन्होंने विशेष रूप से युवा पीढ़ी को संबोधित करते हुए कहा कि "आज के आधुनिक समय में भी हमारे रीति-रिवाज और जोम-जाति व्यवस्था प्रासंगिक हैं। आवश्यकता है उन्हें आधुनिक दृष्टिकोण के साथ समझने और संरक्षित करने की। यदि नई पीढ़ी इससे कट जाएगी, तो हमारी सांस्कृतिक अस्मिता खो जाएगी।" अपनी जड़ों से जोड़ने की एक सशक्त कोशिश थी। उनके द्वारा दिए गए विचार न केवल जानकारीपूर्ण थे, बल्कि सांस्कृतिक चेतना और सामाजिक एकता की पुनःस्थापना का आह्वान भी है।
🔷 शेखर चंद्र माहली का युवाओं के नाम स्पष्ट और गंभीर संदेश: बैठक को संबोधित करते हुए शेखर चंद्र माहली ने समाज के युवाओं को एक अहम और संवेदनशील विषय पर मार्गदर्शन दिया। उन्होंने कहा कि माहली समाज की सांस्कृतिक पहचान, परंपराएं और सामाजिक संरचना वर्षों से एकजुटता और विशिष्टता की बुनियाद पर खड़ी रही है। इन परंपराओं को बनाए रखने और आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी विशेष रूप से हमारे युवाओं की है।

⚠️ अंतर्जातीय विवाह के विषय में उन्होंने स्पष्ट किया कि -
माहली समाज अंतर्जातीय विवाह को मान्यता नहीं देता है।
जो व्यक्ति अन्य समाजों में विवाह करते हैं, उन्हें समाज की ओर से कोई सामाजिक सहयोग या समर्थन नहीं मिलेगा।
ऐसे लोगों को गांव के माझी या किसी सामाजिक व्यवस्था द्वारा किसी भी सामूहिक कार्य, सामाजिक अनुशंसा या परंपरागत भूमिका में स्वीकार नहीं किए जाएंगे।
👰♀️ विशेष रूप से उन्होंने कहा कि — यदि कोई लड़की अन्य समाज से माहली समाज में आती है, तो वह हमारी परंपराओं, धार्मिक रीति-रिवाजों और सामाजिक व्यवस्थाओं से अनभिज्ञ होने के कारण किसी भी शुभ और पवित्र पारिवारिक या सामाजिक कार्यों — जैसे पूजन, संस्कार, देवकार्य आदि — में भाग लेने के लिए योग्य नहीं मानी जाएगी, जो परंपरागत चली आ रही हैं, इसे बनाए रखना चाहिए।
👉🏼 हालांकि, घर के निजी कार्यों और पारिवारिक दिनचर्या के संचालन में कोई रोक नहीं है, परन्तु माहली समाज की पवित्रता और संस्कृति की रक्षा के लिए यह अति आवश्यक है कि सामूहिक धार्मिक, सामाजिक व सांस्कृतिक गतिविधियों में भागीदारी उन्हीं की हो जो समाज की मूल परंपराओं से जुड़े हों।
🚫 यदि कोई व्यक्ति समाज के नियमों की अवहेलना करता है और सामाजिक मर्यादाओं का उल्लंघन करता है, तो उन्हें समाज की ओर से सामाजिक दंड का भागी बनाया जाएगा।
🔚 उन्होंने युवाओं से अपील की कि: "ऐसे कृत्य जिनसे समाज दिशाहीन हो जाए, उनकी पुनरावृत्ति नहीं होनी चाहिए। समाज को सशक्त, संगठित और स्वाभिमानी बनाए रखने के लिए हम सभी को मिलकर एकजुट होकर कार्य करना होगा।
हमारी पहचान हमारी संस्कृति है — इसे बचाए रखना हम सभी की साझेदारी और जिम्मेदारी होनी चाहिए।
🫱 महली समाज इस ऐतिहासिक प्रयास का हार्दिक स्वागत करता है और आगामी चरणों में सभी क्षेत्रों से सक्रिय सहभागिता की अपेक्षा करता है।
🔷 पारंपरिक जीवनचक्र 🔁 अनुष्ठानों पर सर्वसम्मति से निर्णय।

बैठक के एक अत्यंत महत्वपूर्ण और सांस्कृतिक सत्र में पोनोत माझी, परगना, एवं नायके द्वारा आदिम माहली समाज के जीवन से जुड़े सभी प्रमुख संस्कारों एवं अनुष्ठानों पर गहराई से विचार-विमर्श प्रस्तुत किया गया। इस दौरान, उन्होंने जन्म से लेकर मृत्यु तक की समस्त पारंपरिक प्रक्रियाओं एवं उनके पीछे छिपे सामाजिक-सांस्कृतिक संदेश, तथा उनमें उपयोग होने वाली वस्तुओं की उपयुक्तता, संख्या और मात्रा को लेकर एक समरूप और समाजहितकारी प्रारूप की आवश्यकता को रेखांकित किया।

🧒🏻 जन्म के उपरांत के अनुष्ठान:
छटियर (नामकरण एवं नवजात के स्वागत), लूतुर पाटी (कान छेदन) पहली बार अन्न ग्रहण (मुंह जुटी), सेता बापला आदि अनुष्ठान पर चर्चा करते हुए इन रीतियों में प्रयोग होने वाली परंपरागत सामग्रियों की स्पष्ट सूची और मात्रा तय करने की आवश्यकता जताई गई।

👰♀️ विवाह एवं उनके चार प्रकार:
पारंपरिक रूप से माहली समाज में प्रचलित विवाह के चार प्रमुख प्रकारों पर विस्तार से विचार किया गया साथ ही इन सभी प्रकारों में प्रयुक्त होने वाली सामग्रियों की संख्या और मात्रा को प्रसंग के अनुरूप उपयोगिता के हिसाब से समाज के सभी माझी बाबाओं और उपस्थित पारंपरिक जानकारों से सुझाव लेकर सर्वसम्मति से निर्धारित किया गया।

⚰️ मृत्यु एवं उसके उपरांत के अनुष्ठान:
जांग बाहा जाति (अस्थि विसर्जन)
दसकर्म / श्राद्ध (पिण्डदान एवं कर्मकांड)
पर भी विशेष रूप से चर्चा की गई। इन संस्कारों में अपनाए जाने वाले नियम, विधियाँ, एवं समग्री की सूची पर सभी पारंपरिक पदाधिकारियों की राय लेकर उन्हें संशोधित, यथोचित एवं सामाजिक सुसंगति में ढालकर सर्वसम्मति से पारित किया गया।
📝 यह पूरी प्रक्रिया समाज में संस्कृति की समानता, खर्चों की मर्यादा, तथा नव पीढ़ी को स्पष्ट दिशा देने की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण रही।
सभी रीति-रिवाजों की मानक प्रक्रिया, सामग्री की मात्रा, और कदम-दर-कदम निर्देश अब साझा रूप से तय किए गए हैं, जिससे भविष्य में भ्रम, असमानता या अशुद्ध अनुष्ठानों की संभावना समाप्त हो।

📢 यह ऐतिहासिक निर्णय आने वाली पीढ़ियों को एक ठोस सांस्कृतिक मार्गदर्शन देगा और माहली समाज की सांस्कृतिक एकरूपता को और अधिक मज़बूती प्रदान करेगा।
उपस्थित प्रमुख प्रतिनिधि:
बैठक में ओडिशा और झारखंड राज्यों के विभिन्न जिलों से दर्जनों प्रतिनिधि समेत ओडिशा पोनोत परगना लक्ष्मण माहली, पोनोत जोग माझी राजकिशोर हांसदा, पोनोत नायके बाबा उपेन्द्र बेसरा, समाई माहली, श्यामलाल माहली, शेखर चंद्र माहली, सुमित्रा हेंब्रम, संघमित्रा हेंब्रम, रामचंद्र माहली, किशन सोरेन, मोहन माहली, रवींद्र माहली साथ ही सैकड़ों की संख्या में विभिन्न गांवों से आए माझी बाबा, परगना बाबा, नायके, गोडेत भी बैठक में शामिल हुए।

📣 संपूर्ण महली समाज के सभी लोगों से अनुरोध है कि वे इस सांस्कृतिक आंदोलन का हिस्सा बनें और अपनी ऐतिहासिक परंपराओं को संरक्षित करने में योगदान दें। और आगामी बैठक को सफल बनाने हेतु सभी माझी, परगना, गोड़ेत, नायके एवं युवाओं से सक्रिय सहयोग करने की अपील करते है।
जय महली समाज ✊ जय आदिवासी 🏹
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