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9 अगस्तविश्व आदिवासी दिवस

"संयुक्त राष्ट्र संघ UNO ने कहा-‘हम आदिवासियों के साथ हैं।"

’ भारत सरकार ने कहा-‘भारत में आदिवासी हैं, ही नहीं।


’ 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस है।

कितने आदिवासी जानते हैं कि यह दिन कब से और क्यों मनाया जाता है

विश्व आदिवासी दिवस के प्रति सरकार और खुद आदिवासियों के क्या दायित्व है

आदिवासियों के निर्वाचित जन प्रतिनिधि और आदिवासी कोटे में नियुक्त लोक सेवक विश्व आदिवासी दिवस के मकसद को पूरा करने के लिये अपने आदिवासियों के प्रति कितने समर्पित और निष्ठावान हैं

The World's Indigenous अर्थात् विश्व के इंडिजिनस पीपुल अर्थात् विश्व के आदिवासियों के हकों और मानव अधिकारों को विश्वभर में क्रियान्वित करने और उनके संरक्षण के लिए अब से 37 वर्ष पूर्व अर्थात् वर्ष-1982 में संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) द्वारा एक कार्यदल (UNWGEP) नामक उप आयोग का गठन किया गया।

जिसकी पहली बैठक 9 अगस्त 1982 को सम्पन्न हुई थी। उक्त कार्यदल ने आदिवासियों की समस्याओं के निराकरण हेतु विश्व के तमाम देशों के ध्यानाकर्षण के लिए सबसे पहले विश्व पृथ्वी दिवस 3 जून 1992 के अवसर पर होने वाले सम्मेलन के एजेंडे में रिओ-डी-जनेरो (ब्राजील) सम्मेलन में विश्व के आदिवासियों की स्थिति की समीक्षा और चर्चा का एक प्रस्ताव पारित किया गया।

ऐसा विश्व में पहली बार हुआ जब कि आदिवासियों के हालातों के बारे में संयुक्त राष्ट्र संघ के मंच पर प्रस्ताव पारित किया गया।

संयुक्त राष्ट्रसंघ ने अपने गठन के 50वें वर्ष में यह महसूस किया कि 21वीं सदी में भी विश्व के विभिन्न देशों में निवासरत आदिवासी लोग अपनी उपेक्षा, गरीबी, अशिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव, बेरोजगारी एवं बन्धुआ एवं बाल मजदूरी जैसी समस्याओं से ग्रसित है। अतः 1993 में UNWGEP कार्यदल के 11वें अधिवेशन में आदिवासी अधिकार घोषणा प्रारूप को मान्यता मिलने पर 1993 को पहली बार विश्व आदिवासी वर्ष एवं आगे हमेशा के लिये 9 अगस्त को आदिवासी दिवस घोषित किया गया।

आदिवासियों को उनके अधिकार दिलाने और उनकी समस्याओं का निराकरण, भाषा संस्कृति, इतिहास आदि के संरक्षण के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा द्वारा 9 अगस्त 1994 में जेनेवा शहर में विश्व के आदिवासी प्रतिनिधियों का विशाल एवं विश्व का प्रथम अन्तर्राष्ट्रीय आदिवासी सम्मेलन आयोजित किया। 9 अगस्त, 1994 को विश्वभर के आदिवासियों की संस्कृति, भाषा, मूलभूत हक को सभी ने एक मत से स्वीकार किया और आदिवासियों के सभी हक बरकरार हैं, इस बात की पुष्टि कर दी गई और संयुक्त राष्ट्रसंघ ने यह कहकर वचन आदिवासियों को दिया कि-‘हम आपके साथ है।

’ संयुक्त राष्ट्रसंघ (UNO) की जनरल असेम्बली (महासभा) ने व्यापक चर्चा के बाद 21 दिसम्बर, 1993 से 20 दिसम्बर, 2004 तक आदिवासी दशक और 9 अगस्त को International Day of the world's Indigenous people (विश्व आदिवासी दिवस) मनाने का फैसला लेकर विश्व के सभी सदस्य देशों को विश्व आदिवासी दिवस मनाने के निर्देश दिये।

इसके बाद विश्व के सभी देशों में इस दिवस को मनाया जाने लगा, पर अफसोस भारत के आर्यों की मनुवादी सरकारों ने आदिवासियों के साथ धोखा किया| आदिवासियों को न तो इस बारे में कुछ बताया गया और ना ही विश्व आदिवासी दिवस मनाया गया।

आदिवासियों के हालातों में कोई सुधार नहीं होने पर संयुक्त राष्ट्र संघ ने 16.12.2005 से 15.12.2014 को दूसरी बार फिर से आदिवासी दशक घोषित किया गया।

आज यह बताते हुए गहरा दुख और अफसोस होता है कि भारत की सारी सरकारें आदिवासियों के प्रति संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रस्ताव के बाद भी आज तक धोखेबाज और निष्ठुर बनी हुई है। आखिर क्यों इस सवाल का जवाब जानना होगा।

लेकिन यह जानकर पाठकों को घोर आश्चर्य होगा कि 25 साल पहले जब प्रथम आदिवासी दिवस सम्मेलन 1994 में जेनेवा में यूएनओ द्वारा आयोजित हुआ। जिसमें विश्व के सभी सदस्य देशों से प्रतिनिधि बुलाये गये थे।

भारत सरकार की तरफ से केन्द्रीय राज्य मंत्री के नेतृत्व में एक प्रतिनिधि मंडल ने जिनेवा सम्मेलन में भाग लिया था। इस सम्मेलन में भारत सरकार के प्रतिनिधि द्वारा सँयुक्त राष्ट्र संघ को अवगत कराया था कि ‘संयुक्त राष्ट्र द्वारा परिभाषित आदिवासी लोग (अर्थात् अनुसूचित जनजातियां) भारत में हैं ही नहीं।’

बल्कि इसके विपरीत संयुक्त राष्ट्र संघ को बताया गया कि ‘भारत के जनजाति लोग ही भारत के आदिवासी (मूलवासी) हैं। क्या भारत की जनजातियां किसी प्रकार के सामाजिक, राजनीतिक या आर्थिक पक्षपात की शिकार नहीं हो रहे हैं’इससे बड़ा सरकारी झूठ और क्या होगा

जय आदिवासी


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